कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

दीवार:

कहीं कोई दीवार उभर रही है
चुपचाप, अचेत, अदृश्य
देह को सहला-सहला जाती पौष-माघ की धूप जितना भी
खटका नहीं उसका
दबे पाँव चली आती मौत जितना भी
सन्देह नहीं उस पर
लेकिन कोई दीवार उभर रही है ज़रूर….

-अनुवाद: मनजीत कौर भाटिया

Esther Warkov: A Procession, Oil on Canvas

दीवार

कहीं कोई दीवार उभर रही है
चुपचाप, अचेत, अदृश्य
देह को सहला-सहला जाती पौष-माघ की धूप जितना भी
खटका नहीं उसका
दबे पाँव चली आती मौत जितना भी
सन्देह नहीं उस पर
लेकिन कोई दीवार उभर रही है ज़रूर

पिछली बार जब तुमसे मिला था
जानता नहीं था कि मैं
पहुँचा था तेरे पास,
अपनी दीवारों के साथ
मेरे बोलों में शामिल थी
दीवारों की आवाज़
नहीं जानता था कि तुम भी बोल रही थीं
दीवारों की ओट से
और अब जब मुझे पता चल ही गया है
तो भी एक दीवार ही तो उभर रही है
चुपचाप, अचेत, अदृश्य

धर्म दीवार है
देश दीवार है
दीवार है भाषा भी
दीवार है अपने बारे में मेरी राय
दीवार है तेरे बारे में मेरी राय
और तेरी भी राय अपने बारे में
मेरे बारे में, दुनिया-जहान के बारे में
इनको तोड़कर भी ज़मीन नहीं होती समतल
किसी से मिलने की राह
किसी और से बिछुड़ने की राह ही तो है
टूटती हुई दीवार भी एक उभरती हुई दीवार ही तो है!

कल हमने मिलकर किये थे जो वादे
दीवारें हैं
इनको निभाएँगे
इनकी ओट से दुनिया को पुकारेंगे
या चुप रह जाएँगे
हम और तुम पास-पास आते जाएँगे
हम और वे और-और दूर-दूर होते जाएँगे
इन दीवारों को तोड़ने से डरेंगे
दीवारों के साथ जीएँगे
दीवारों के साथ मरेंगे
रहेंगे घिरे

आज फिर सूरज के अंग-संग
एक दीवार उदय हुई है।
जो उभरती चली जाएगी
ऊँची और ऊँची दोपहर तक
सूरज ढल जाएगा
अस्त हो जाएगा
दीवार नहीं ढलेगी
अस्त नहीं होगी

कहीं कोई दीवार उभर रही है
चुपचाप, अचेत, अदृश्य।

चौथे का इन्तजार

हाँ, तीन जनों के कन्धों पर
चला जा रहा वह जनाज़ा
उसी कवि का है
जिसने अपने लिए
ऐसी पेशीनगोई की थी

उस दिन वह कोई रुबाई लिख रहा था शायद
जिसकी पहली तीन पंक्तियाँ
अनायास ही सूझ गई थीं उसे
और चौथी का वह इन्तजार करता रहा

कुछ देर इन्तज़ार के बाद
रुबाई उसने बीच में ही छोड़ दी
और खुद कॉफ़ी बनाने में जुट गया

कॉफ़ी पीते हुए
पास बैठी पत्नी से उसने कहा:
मेरी गै़रहाज़िरी में
तुम मेरे बहुत से काम सँवारती रही हो
एक काम और निभा देना मेरा
बस आख़िरी बार……….

जब अपने बहुत-से काम
अधूरे छोड़कर
मैं विदा होने लगूँ
तीन काँघिये तो तीन अलग-अलग दिशाओं से
अपने आप चले आएँगे
और, चुपचाप
नहलाने-धुलाने लग जाएँगे
मुझे अपना ‘खास’ समझकर

और चौथा?
‘चौथे’ का इन्तज़ार करना होगा

इन्तज़ार खत्म न हो तो खीझना मत
बुरा न मानना
हो सकता है चौथा बेचारा
मेरी ही तलाश में कहीं भटक रहा होगा
कि शायद मिल जाऊँ कहीं उसे
ताकि वह ख़त्म कर सके
मेरा उत्पीड़ित जीवन
उसको शायद पता ही न हो
कि जो काम करने का उसने बीड़ा उठाया था
मौला मेहरबान के हाथों पूरा हो गया…….

खैर, तुम इन्तज़ार ज़रूर करना
खीझना नहीं
और, न ही रोकना तीनों काँधियों को
उनके काम से, मेरे सारे ही काम
मेरे अपने ही अन्दाज़ में पूरे होते रहे हैं
हो सकता है
तीन काँधियों के कन्धों पर
श्मशान पहुँचना भी
मेरे अस्तित्व का अपना ही ढंग हो
अन्तिम……..

और, वह जनाज़ा
उसी कवि का चला जा रहा है।

वह मर रहा है

वह मर रहा है
जो कभी मेरे पीछे-पीछे चलता रहता था
मुड़कर मैं देखूँ
तो फ़ौरन ग़ायब हो जाता है

वह मर रहा है
धूप में मेरी परछाईं
छाँह में चलूँ
तो आग का धब्बा-सा बन जाता था
कभी दिल में धड़कता था साँस बनकर
तो कभी सुलगता पावों तले अंगारा बनकर

वह मर रहा है
मेरा मुख़बिर
मेरा दोस्त
गुनाह के दरवाज़े तक वह मेरे अंग-संग था
शहतीर को लगे घुन की तरह
कुतर-कुतर बोलता
हथेली पर रखे दीये की तरह
चिल्लाता: आगे कुआँ है, खाई है

मैं दहलीज़ लाँघ गया
तो वह बाहर ही खड़ा रहा
गुनाह से निबट कर, लिपट कर
मैं बाहर आया
तो फिर मेरे पीछे-पीछे हो लिया
सिर पर उठाए
निचुड़ती गठरी मेरे गुनाहों की
कहीं न जाऊँ
तो दुबक कर किसी कोने में बैठ जाता था
हल्की-सी रोशनी वाला दीया जला देता था
और खुद ही मुझे मुझसे छिपाने के लिए
दीया बुझा भी देता था

वह मर रहा है
शायद वह थक गया है
मेरे साथ चलते-चलते
मेरे मन में बैठे-बैठे

ढहती दीवार-सा शोर कानों में गूँजा
इधर-उधर देखा
कहीं कुछ भी नहीं था।

कोई देख रहा है

कोई देख रहा है
घर की दीवारों में छेद हैं
छेद हैं मेरी देह में भी
अन्तरात्मा में छुपकर बैठे हुए को भी
कोई देख रहा है

मैं तुझे सपने में मिला
जहाँ तेरे और मेरे सिवा और कोई नहीं था
मैं तुझे वही सब कह रहा था
जो युग-युगान्तर से हर मर्द औरत से कहता चला आ रहा है
और तू खुशी-खुशी सुन भी रही थी
तब भी तूने अपनी खुशी होठों में ही दबा ली
मेरे मुँह पर हाथ रख दिया
और फुसफुसाकर कहा,
कोई देख रहा है

सुबह सवेरे
जब मैं था अकेला, दरवाज़े थे बन्द, दीप बुझा, आँखें मिचीं
मीठी नींद की दलदल में लेटा
टूट चुके सपने को फिर से जोड़ने की कोशिश में था
तब भी जबकि मेरे सिवा वहाँ कोई और नहीं था
मेरे अन्दर के किसी कुएँ में से आवाज़-सी आती
खबरदार! सावधान!
कोई देख रहा है
देखता है कोई उसको जो देखता है
और उसको भी जो देखने से झिझकता है
क्योंकि कोई देख रहा है

भीड़ में बियाबान में
सामने भी पीछे भी
एक आँख हमेशा खुली है मेरे लिए
जो सदा मुझे देखती रहती है
और देखने से रोकती रहती है
रुका-रुका भी मैं देखता हूँ उसे जो देखने लायक है
जब कुछ भी नहीं देखता
तब भी दायें-बायें नज़र डाल लेना चाहता हूँ
कि मुझे कोई देख तो नहीं रहा!

मैं कैसे हो जाऊँ नंगा, निश्शंक, निश्छल तेरे लिए
उदय हो सकेगी तू भी कैसे बेझिझक मेरे लिए
एक दूसरे के लिए बने हम
एक दूसरे से छुपते हैं झिझकते हैं
क्योंकि
कोई देख रहा है।

रेत की आवाज़

सुनो,
रेत चली आ रही है

चलती है रेत जैसे बदन पर चले घुमौरी
खून में चलता जैसे नागिन का दंश
सुनो रेत चली आ रही है
लेकिन पहले मद्धम कर लो
अपने अन्दर के शोर को

सुनो,
रेत के ऊपर गिर रही रेत को
पत्तों के शरीर पर बैठी हुई रेत को
पत्तों के शरीर को बींधकर
आगे बढ़ी जातीं रेत की चिनगारियाँ
पेड़ों पर अब नहीं लहलहाते हरे-हरे पत्ते
पत्तों की जगह लटकते हैं अब पत्तों के पिंजर
जो कहते हैं:
रोकने से नहीं रुकती
रेत चली आ रही है

सड़कों पर बिछी है रेत
राहों की लकीरें सब रेत ने मिटा दीं
दरो-घरों के आस-पास
भले-से आदमी भी लगते हैं
राही जैसी मरुभूमि में गुम
मुद्दतों से पैरों लगे रास्ते
बन गये वीराने जैसे देश बेगाने के

अब तो पहुँच गयी रेत
गाँव की सीवान पर
खेतों में, फ़सलों पर
छोटी-छोटी फुंसियाँ बन टिकी हैं
जानवर भी पहचाननते हैं
इस बार का चारा कुछ अज़ीब-सा लगता है
दाँतों में किच-किच कंकड़ियाँ-सी फँसी है
रेत चली आ रही है

पलकों में फँसे हुए रेत के कण
आँखों में किरकिरी रेत की
नज़र में असमंजस है
जे़हन में रेंगते हैं
गर्म-गर्म कीड़े और रेत के विषाणु
सोचने में, बोलने में
रेत के बीज हैं

रात को शय्या पर भी
एक दूसरे को चुभते हैं चूरा-से
एक सोचता है:
दूसरा यह आया न जाने कहाँ से
कौन से रेगिस्तान से
रेत चली आ रही है

सुनो,
कन्धे से कन्धा भिड़ रहा रेत का
कल तक शहर गाँव
सपाट मैदान होंगे
आदमी होंगे भुरभुरी रेत के बुत-से
बोलेगे तो डरेंगे
धीरे-धीरे झर न जाएँ
रेत की दीवारों की तरह
चुप रहेंगे तो
सहमे-सहमे
अपना अस्तित्व भी
चींटियों की बाँबी-सा लगेगा
बाहर से अन्दर
अन्दर से बाहर की ओर
रेत ही रेत सदा चली आती दिखेगी
आदमी का आदमी से मिलना
हो जाएगा तप रही रेतों का
नंग बदन तप रही रेतों पर गिरना

सुनो,
रेत चली आ रही है
लेकिन पहले मद्धम कर लो
अपने अन्दर के शोर को।

कविता में लड़की

मुझे यहाँ से न निकालो
मुझे नहीं जाना कहीं और
यहाँ बहुत सुख है
सलामती है

यहाँ नर्म-नर्म धूप है
मेरे बदन के सहने लायक
नन्ही-नन्ही बूँदों की बारिश है
तन-मन को झंकृत करती झुरझुरी
जो सीमा-रेखा से पार नहीं जाती
यहाँ तो देखने वाले की आँख में भी

ईश्वर बसता है
यहाँ बहुत सुरक्षा है, रियायत है
मुझे यहीं रहने दो

तुमने मुझे जो लिबास पहनाया
वह बहुत महीन है
उसके आर-पार तन से मन तक पहुँचती
सारी राहें दिखाई देतीं
मेरी देह का हर खुशनुमा हिस्सा
नज़रों के लिए खुला है
इस बाज़ार से गुज़रते हुए
मुझे कपड़ों की सलवटें बार-बार सँवारनी नहीं पड़ती
न ही ढके हुए बदन से
कहीं कोई पल्लू खिसक जाने का डर है
जो है जहाँ है जैसा है
टिका रहता है सर्वदा पूर्णतः
इसको यूँ ही रहने दो
यहाँ चाहे पोथियों में बन्द कर दो
चाहे महफ़िल में बिखेर दो
न तो मेरा दम घुटता है
न शर्म ही महसूस होती है
पर्दे में, बे-पर्दे में
मैं दोनों ही तरह से प्रसन्न हूँ
यहाँ मैं अप्सरा हूँ नाचती गाती
देवता बहुत भले हैं
मेरा ऐसा खूबसूरत स्वर्ग न बिगाड़ो
मैं यहीं बस चुकी, मुझे यहीं बसा रहने दो

बाहर कड़ी धूप है
आँधी है बारिश है
इसमें खप-तपकर मैं पिघल-बिखर जाऊँगी
शक्ल-बदशक्ल हो जाएगा मेरा चेहरा
आँखों की लपट
वस्त्रों को लाँघकर
मेरा बदन जला डालेगी
पर्दों में गल जाऊँगी
बेपर्दा होकर ठोकरें खाऊँगी
मेरी तारीफ़ में कही गयी बातें मुझे भरमाएँगीं
तारीफ़ को नकारूँ अथवा स्वीकारूँ
मेरा तो नुकसान ही नुकसान है।

नहीं, नहीं, मुझे यहीं रहने दो
यहाँ बहुत सुख है।

One comment
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  1. In truth, immediately i didn’t understand the essence. But after re-reading all at once became clear. A magnification of 12.5 or greater is typical of binoculars telescopes.

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