गगन गिल
By admin | December 29th, 2009 | Category: लेखक | 2 commentsएक अनवरत आत्मालाप का कवि : हरिभजन सिंह कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
एक अनवरत आत्मालाप का कवि : हरिभजन सिंह कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
हमारे यहाँ व्यक्ति की पहचान यह है। धन-धान्य नहीं है। न कभी थी। न अभी तक पूर्ण रूप से समझ में आयी है। परन्तु उपभोक्ता समाज में रहते हुए सारे संसार के चलन को देखते हुए अब बहुत कुछ अनिश्चित हो गया है। प्रकृति के साथ, प्राकृतिक रूप से रहना या फिर इनसान की बनायी वस्तुओं के साथ रहना। दोनों में से क्या चुने कोई। वस्तुओं के साथ रहते हैं तो भारतीय मन को बहुत अपराधबोध महसूस होता हैकृना रहे तो उसका आत्मसम्मान जाता है, बाहर समाज में। दोनों ही स्थितियों में भारतीय मन कहीं फँस-सा गया है, और ऐसी ही स्थिति हम रचनाकर्मियों की है जिन्हें लोग कलाकार कहते हैं।
-सिद्धार्थ
आप देख रहे हैं कि मैं बोलते समय तनिक भी इस बात का ध्यान नहीं करता कि मेरे शब्द किस-किस भाषा से आ रहे हैं। केवल इस बात का ध्यान जरूर है कि उनकी ध्वनि मेरी भाषा में खप जाए। समझदार आदमी इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करते कि भाषा की दौलत कहाँ से आ कर इकट्ठी हो रही है। खाली देखते हैं कि भाषा में नये शब्द घुल-मिल गये या नहीं। मैं आपको एक सिद्धान्त की बात बताता हूँ कि बे-पढे़ लोग पढ़े हुए लोगों के बनिस्बत भाषा अच्छी बनाते हैं। वह दूसरी भाषा के शब्द को अपनी भाषा के अनुरूप बना लेते है जब कि पढ़े-लिखे लोग केवल नक़ल करते हैं।
-राम मनोहर लोहिया
‘‘…….कविता मात्र आवेग नहीं…..अनुभव है। एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत-से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत-से पशु और पक्षी……पक्षियों के उड़ने का ढब। नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात में खिलने की मुद्रा। अज्ञात प्रद्शों और अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। औचक के मिलन। कब से प्रस्तावित बिछोह। बचपन के निपट अजाने दिनों के अनबूझे रहस्य। माता-पिता, जिन्हें आहत करना पड़ा था, क्योंकि उनके जुटाए सुख उस घड़ी आत्मसात नहीं हो पाए थे। आमूल बदल देनेवाली छुटपन की रुग्णताएँ। ख़ामोश कमरों में दुबके दिन। समुद्र की प्रात। समुद्र खुद। सब समुद्र। सितारों से होड़ लगाती यात्रा की गतिवान रातें।
नहीं, इतना भर ही नहीं। उद्दाम रातों की नेहभरी स्मृतियाँ…….प्रसव में छटपटाती औरत की चीखें। पीला आलोक। निद्रा में उभरती सद्यःप्रसूता। मरणासन्न के सिरहाने ठिठके क्षण। मृतक के साथ खुली खिड़की वाले कमरे में गुज़ारी रात्रि और छिटका शोर।
नहीं, इन सब यादों में तिर जाना काफ़ी नहीं। तुम्हें और भी कुछ चाहिए-इस स्मृति सम्पदा को भुला देने का बल। इनके लौटने को देखने का अनन्त धीरज।……जानते हुए कि इस बार जब वे आएँगी तो यादें नहीं होंगी। हमारे ही रक्त, भाव और मुद्रा में घुल चुकी अनाम धपधप होगी। जो अचानक अनूठे शब्दों में फूटकर, किसी भी घड़ी बोल देना चाहेगी अपने-आप…..।’’
-राइनेर मारिया रिल्के
अनुवाद: राजी सेठ